लेखन के क्रमिक विकास पर कुछ नोट्स–
©कमलेश कमल
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हर रचनाकार कभी-न-कभी इस प्रश्न से जूझता ही है कि वह लिखता क्यों है।
कारण नितांत भिन्न हो सकते हैं…होने भी चाहिए। हर सर्जक का समय, समाज और स्वयं से संवाद करने का सलीका और तरीक़ा भिन्न होता है।
अपनी बात करूँ, तो क्यों लिखता हूँ, कब लिखता हूँ… इन प्रश्नों का मेरे पास कोई समीचीन, पांडित्यपूर्ण अथवा अर्थगांभीर्ययुक्त समीचीन उत्तर नहीं है। जैसे भूख लगने पर खा लेता हूँ, नींद आने पर सो लेता हूँ, ऐसे ही लिखने का मन होने पर लिख लेता हूँ। इस अर्थ में, संभवतः, यह मेरा स्वाभाविक गुणधर्म है।
सोचता हूँ, तो यह पाता हूँ कि लिखना मेरे लिए इतना दुरूह कर्म कभी नहीं रहा कि दुनिया से अलग, किसी बंद कमरे में, निपट अकेले पन्ने काले करता रहूँ या मोबाइल के स्क्रीन की रोशनी में देर तक आँखें ख़राब करता रहूँ। यह मेरी स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया हैै, अकेलेपन का उत्सव है, एकांत का मौज़ है।
वस्तुतः, साहित्य-सर्जना की आकांक्षा किसी के लिए भी संवेदना से उद्भिद होती है, स्वैरिता से विवक्षित होती है। साथ ही, यह भी ध्रुव सत्य है कि लोगों से जुड़ने की असीम चाह भी व्यक्ति को लेखन से जोड़ती है। सामान्यतः, आरंभिक रचनाओं का कौमार्य आत्मालाप के रूप में शब्दों में उद्घाटित होता है, जो आगे समाज सुधार की आकांक्षा से मानव मूल्यों की स्थापना तक के उद्देश्य में परिणत हो सकता है।
वैसे, सब उद्देश्य खोकर जब लेखन आत्म- साक्षात्कार की कीमियागीरी बन जाए; तो यह अपने सर्वोत्तम रूप में प्रकट होता है, आविर्भूत होता है। अस्तु, इतना महान् लेखक होने का मुगालता किसी लेखक को नहीं पालना चाहिए।
अपने संदर्भ में बात करूँ, तो लिखना मेरे लिए जीवन जीने का ढंग है, वे ऑफ लाइफ है। जीवन से जैसे-जैसे रूबरू हो रहा हूँ; बटोरे हुए को अपनी रचनाओं में पिरो रहा हूँ, कड़वत कर रहा हूँ, उद्घाटित, उद्भासित कर रहा हूँ।
दुनिया भर के विद्वज्जन इस एक बात पर एकमत हैं कि लिखने की पहली शर्त है पढ़ना। भावना, साधना आदि सब बाद की बातें हैं, परवर्ती हैं और आनुषंगिक हैं। हाँ, लिखने का उद्दीपन, लिखने के निकष आदि अवश्य भिन्न हो सकते हैं, होते हैं।
पुनः, अपनी बात करूँ, तो मैं किसी ऐसे गुण का साक्षी नहीं हूँ, जो बिना कुछ पढ़े साहित्य-सर्जना को संभव बना दे। हाँ, पढ़ने के उपरांत भी शब्दों को सजीव कर देना बहुत अलग बात है और वही लेखनकर्म में सर्वाधिक महत्त्व की बात है। मेरा यह भी मानना है कि ईश्वरीय वरदान प्राप्त कुछ अपवादों को छोड़कर सभी अच्छे लेखक घनघोर पढ़ाकू होते हैं। ऐसे में, बात वहीं जा कर ठहरती है कि सब देखे, पढ़े, समझे अथवा अनुभूत को सुंदर शब्दों में पिरो देने की कला ही लेखन का मर्म है।
इसके साथ ही, एक तथ्य यह भी है कि लेखन किसी के लिए अपने व्यक्तित्व की विसंगतियों को अनुभव कर पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्त करने और स्वयं को विकसित होने का एक माध्यम या ज़रिया भी हो सकता है। इस दृष्टिकोण से, किसी साहित्यिक कृति को पढ़ना भी रेचन, विरेचन और आत्मचेतन का एक अवसर प्रदान कर देता है। इससे यह भी निष्पन्न होता है कि व्यक्तिगत रूप से लेखक के लिए लिखना एक सतत विकसनशील अवधारणा है।
आपका ही,
कमल
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