पैसों वाले पर्व मनाएँ, निर्धन देखें जेबें खाली। क सोचे क्या-क्या ले आऊँ, इक सोचे जाती कंगाली।।
पैसों वाले पर्व मनाएँ, निर्धन देखें जेबें खाली।इक सोचे क्या-क्या ले आऊँ, इक सोचे जाती कंगाली।। रिझा रहे लक्ष्मी से, लक्ष्मी,कुल उच्चवित्त हर्षित होकर।चिंताओं कुछ पल सो जाओ,कहती रही गरीबी…

