देवभूमि में हरेला की धूम: मुख्यमंत्री धामी ने अल्मोड़ा के जागेश्वर धाम से किया राज्य स्तरीय उत्सव का आगाज़, श्रावणी मेले का भी किया भव्य उद्घाटन

अल्मोड़ा/जागेश्वर: उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोकपर्व ‘हरेला’ आज पूरे प्रदेश में पारंपरिक श्रद्धा, उत्साह और पर्यावरण संरक्षण के महासंकल्प के साथ मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर आज राज्य स्तरीय मुख्य कार्यक्रम अल्मोड़ा जिले के गुरड़ाबांज और जागेश्वर धाम में आयोजित किया गया, जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आज दोपहर अल्मोड़ा पहुंचे, जहां स्थानीय जनता और प्रशासन ने उनका भव्य स्वागत किया। सीएम धामी ने जागेश्वर धाम मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद उन्होंने ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ कार्यक्रम के तहत जनसभा को संबोधित किया और ऐतिहासिक श्रावणी मेले का विधिवत दीप प्रज्वलित कर उद्घाटन किया। हरेला पर्व के अवसर पर मुख्यमंत्री ने अल्मोड़ा में स्वयं पौधा लगाकर राज्यव्यापी वन महोत्सव की शुरुआत की। उन्होंने प्रदेशवासियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान को गति देने की अपील की। मुख्यमंत्री ने बताया कि सरकार ने हरेला के मौके पर पूरे प्रदेश में 10 लाख पौधे रोपने का लक्ष्य रखा था, जिसे पार करते हुए अब तक 10 लाख 80 हजार से अधिक पौधे रोपे जा चुके हैं। अकेले अल्मोड़ा जिले में ही प्रशासन द्वारा 75 हजार से अधिक पौधे लगाने का अभियान चलाया जा रहा है।
पारंपरिक रूप से, कुमाऊं के घरों में आज सुबह 9 दिन पहले बोए गए पवित्र सात अनाजों के अंकुरों (हरेला) को विधि-विधान से काटा गया। देवी-देवताओं (दिकारे) को अर्पित करने के बाद, घर के बुजुर्गों ने इन सुनहरे-हरे तिनकों को परिवार के छोटे सदस्यों के सिर और कानों पर रखकर पारंपरिक आशीर्वाद दिया: “जी रया, जागि रया, यो दिन बार-बार भेटने रया। धरती जस आग, आकाश जस चाक होइ जये…” पर्व को लेकर कुमाऊंनी और गढ़वाली घरों में पूरी, कचौड़ी, उड़द की दाल के बड़े, पुए और खीर जैसे पारंपरिक पकवान बनाए गए।
एक तरफ जहां पूरे राज्य में उत्सव और पौधरोपण का माहौल है, वहीं देहरादून और शिवालिक वन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए हो रहे पेड़ों के कटान के खिलाफ पर्यावरणविदों और नागरिक समूहों ने असंतोष जताया है। उत्तराखंड महिला मंच और स्थानीय आंदोलनकारियों ने ‘ब्लैक हरेला’ (Black Harela) के रूप में सांकेतिक विरोध दर्ज कराया। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार को केवल नए पौधे लगाने पर ध्यान देने के बजाय सदियों पुराने प्राकृतिक वनों को कटने से बचाने के लिए भी सख्त कदम उठाने चाहिए।
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